मानवों के समुदाय को समाज कहते है । मानव स्वभाव से समुदाय बनाकर रहने का अग्यासी हें । इसीलिए अरस्तू ने मानव को सामाजिक प्राणी कहा है I वह समाज में ही जन्म लेता है और समाज में ही पूर्ण जीवन बिताकर उसके ही अन्दर अन्तकाल को पहुंचता है । समाज के उसका जीवन नहीं और बिना उसके समाज नहीं । इसलिए व्यक्ति और समाज का सम्बन्ध जननी व सन्तान की भाति अभेद्य है I मानव समाज का अग है और समाज उसका अगी I समाज का केन्द्र मानव है और साहित्य का केन्द्र भी मानव ही है और साहित्य का केन्द्र भी मानव ही है । सहित्य का भाव सम्मिक्ति है ईस तरह की हित निहित अभिव्यक्ति समाज से ही अपना पोषण पाती है और समाज का निर्माता मानव ही है I
समाज एव साहित्य मानव की सक्ति ज्ञानराशि का नाम साहित्य और मान-समुदाय का नाम समाज है । मानव का ज्ञान-भण्डार ही साहित्य है और वह समाज की एक इकाई है । इस प्रकार साहित्य और समाज का, प्राण और शरीर की भाति अटूट सम्बन्ध् है । दोनो के लिए एक-दूसरे की सस्तस आपेक्षित है, अर्थात साहित्य के लिए समाज और समाज के लिए साहित्य है I साहित्य का जन्म समाज के बिना असम्भव है । समाज को साहित्य से नवजीवन प्राप्त होता है और साहित्य समाज के द्वारा ही गौस्वान्वित्त होता है । एक पाश्वात्स्य विद्वाम् ने क्ला है साहित्य जीवन की आलोचना है । वास्तव में सामाजिक जीवन की शोभा साहित्य से ही होती है I भलूँहरि ने तो साहित्य रहित मानव का पशुतुल्य माना है- साहित्य की विशिष्टता उसकी उपादेफ्ता के कारण ही होती है । समाज पर प्रभाव डालने पर साहित्य अरण्यसेदन मात्र है । जिस प्रकार भारतीय दार्शनिक धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष. को जीवन का उददेश्य मानते है, उसी प्रकार भारती साहित्यकार भी रस की अनुभूति के अतिरिक्त धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में विचक्षश्ता और कीर्ति तथा प्रीति की प्राप्ति भी साहित्य के उत्देश्य मानते है I
साहित्य का अभिप्राय हित चिंत्तन है । प्रेम चन्द्र एक स्थान पा साहित्य का स्पष्ट करते हुए लिखते है I साहित्य हमारे जीवन को स्वम्भक्ति है यहीं उसका मुख्य उददेश्य हैं Iसाहित्य समाज का दर्पण है :न केबल भारतीय परम्परा अपितु पश्चिमी परम्परा में भी साहित्य को समाज का दपर्ण कहा है । दर्पण में जिस तरह शरीर प्रतिफलित होता है, तरह समाज भी साहित्य ने प्रतिफलित होता है, साहित्य की इस दर्षणवादी परम्परा को थ्यान में स्खते हुए कछ विद्वान इसे समाज का फोटोग्राफ भी कहते है, परन्तु साहित्य को समाज का दर्पण या फोटोग्राफ देने से साहित्य का सामाजिक उस्तरदायित्व उभर का सामने नही आ सका क्योकि जैसा कि हम जानते है, दर्पण में या फोटोग्राफी में व्यक्ति का ऐसा चरित्र सामने आता है, जैसा वह होता है, उसमें किसी तरह का कोई पस्पिर्तन नही हो सका है, एक अच्छा फोटोग्राफर यही तक सीमित नही रहता साहित्य वह का दिखाता जो दर्पण नही का सका । साहित्य में न केवल सामाजिक नुरास्यों प्रतिफलित होती है, बल्कि उन बुराइयों को नष्ट करने के उपाय भी बतलाए है । इस मायने में साहित्यकार न केवल परम्परा का पोषक होता है बल्कि समाज को एक नई दिशा प्रदान में सक्षम होता है । अत: साहित्यकार एक समाज सुधारक भी है! निमणि साहित्य समाज की उपज है, फिर भी कालात्तर में वह एक नये समाज अत: निषर्कतां यह कहा जा सकता है कि साहित्य और सहित्यनकार एक दूसरे की उपज है बल्कि एक दूसरे से प्रभावित भी है I बिना समाज न केक्ल एक दूसरे के पूरक है बल्कि एक के दूसरे का अस्तित्व खतरे में है I जैसा कि पूर्व में वर्णित किया है I
