एकता भारतवर्ष के धर्म, भाषा तथा प्रातीय भेदों पर विदेशियो' ने बहुत बल दिया है । इस देश को उन्होंने एक उप-महाद्वीप है । इस भेद-बुद्धि को तीव्र करके उनकों देश पर अधिकार जमाए रखने में सुविधा मिलती थी । यह बात नहीं कि भारत में प्रात्तीय और भाषा आदि के मेद नहीं हैं, ये भेद सर्वत्र हैँ । इंग्लैण्ड, अमेरिका और अन्यत्र भी हैँ । भेदों में जो एकता होती है वही सौंश्रुष्ट्र और सपन्न' एकता कहलाती है । सर्वत्र एक रसता की एकता दरिद्र एकता होती है । स्वर-साम्य में ही सगीत की अवतारणा होती है ।
भास्तीय सस्कृति में भी इसी प्रकार की एकता है । इस एकता का मूल स्रोत आर्य सस्कृति है । गगाजी की अस्ति उसमें नदी का मिश्रण होता रहा है, परन्तु उसको पावनी शक्ति इतनी प्रबल रही है कि सबको रूप मिल गया है । इस सगमित रूप में ही इसका विकास होता रहा है । यद्यपि इस विकास श्रृंखला' की आदिम और अतिम कडियों में महान् अतर है, तथापि उनमें एक विशेष तास्तम्य रहा है और उनमे माला की गुरियों को बाँधने वाली एक सूत्रता का अभाव नहीं रहा है ।
एकता के सूत्रयद्यपि यह बात ठीक है कि भारत का प्रान्तो में विभाजन करके उनमे पार्थक्य की खाई को गहरा बनाने वाले भाषा, रीति-रित्नाज, शिष्टाचार, ऊसर, पर्वत, सघन वन तथा नदियाँ और ऊबड़-खाबड़ मार्ग जैसे कारण वर्त्तमान रहे हैं, तथापि भारत में एक्ला का तास्मत्य स्थापित करने वाले सृहुँत्रों का भी अभाव नहीं रहा है । सस्मृन्त भाषा और पीछे से भाषाओ का धर्मिक महत्व रहा है । ये भाषाएं पारस्परिक सम्बन्ध को स्थाक्ति करने में बडी सहायक हुई हिन्दूतीर्ध बदरीनारायण से सेतुबंध रामेश्वरम् तक, ज़गन्नाथ पुरी से द्वारका तक यात्री को भारतभूमि की चारों दिशाओं से परिचित करा देते हैं । भारत की मथुरा, माया, काशी, काची आदि मोक्षदायक पुरियाँ भारत की प्रदक्षिणा का देती हैं । तक्षशिला , नालदा (बिहार) , विक्रमशिला ( भागलपुर जिले के सुलतानगज के पास) आदि विश्वविद्यालय तथा, नवद्वीप, (बगाल), आदि अखिल ख्यक्ति के शिक्षा-केन्द्र थे । विद्यार्थी और शिक्षक प्रातीय मेद भूलकर एक व्यापक सस्कृति के निर्माण में योग देते थे आचार्य, वैरागी, स्वामी, सन्यासी और व्यापारी सस्कृति की धस्याओं का सम्मिश्रण कस्ते रहे है । सिपाही और विजेता लोग भी सस्कृति और भाषा के प्रचारक तथा चाहक रहे हैँ । इस प्रकार के रहत्ते हुए भी भारतीय सस्कृति के प्रचार, विकास और एकीकरण के लिए राजमार्ग खुले रहे हैं ।
आर्य और दविढ़ सबसे पहले भेद को बात आर्य और द्रविड़सस्कृति की कही जाती है । द्रविडों को मूल निवासी और आर्यों को बाहर से आए विजेता बताया जाता है । उन विजेताओं के आगे-पोछे आने वाले थी माने जाते हैँ और द्रबिड़ लोग श्री बाहर के आए हुए बताए जाते है यह प्रश्न तो सदा विवादग्रस्त है कि आर्य लोग क्या से आए और जब स्वयं भारत की उत्तरी सीमाएँ निश्चित न हो तब यह प्रश्न ओर भी जटिल हो जाता हैँ । भारतीय दृष्टिकोण तो यह है कि द्रविड़ लोग भी बिगड़े हुए आर्य है । मनु मह्माराज ने भी शक आदि को क्रियाहीन क्षत्रिय माना है । रावण ब्राह्मण ही था और मुलस्ला ऋषि का नाती था, फिर भी उससे सघर्ष रहा । वेदों में शत्रुओं से सघर्ष की बात अवाम आती है, किंतु यह बिगड़े हुए आर्यों से भी हो सक्ता हैं । शकों, यवनों, दरर्दो आदि के सबंध में मनु महाराज का यही है कि ये क्रियालुस हो जाने के कास्पा तथा ब्राह्मण-दर्शन के प्रभाव सै बाहर हो जाने के कारण आर्यो से बाहर हो गए थे ।
अर्थात् घीरेधीरे किया के लोप होने सै, ब्राह्मण-फ्लो से सपर्क' छूट जाने से ये सब क्षत्रिय जातियाँ वृषल तथा दस्यु बन गई, जैसे र्मड्रि, औड्र, द्रविड, चक्ति, यवन, शक, दरद, खश आदि चार वर्णो से रहित जो जातियों हैं, वे चाहे भाषा बोलें और चाहे आर्य भाषा बोलें, सब दस्यु हैँ ।
मध्य एशिया या यूरोप के लोगों के साथ भाषा की समानता की बात दुधारी तलवार है । यहाँ से भी आर्य लोग उधर जा सकते थे । इसमें निश्चयपूर्वक 'इदं इत्थ' को देना कुछ कठिन बात है । पाश्चात्य विद्वानो के तर्क को सहसा तो निराधार नहीं ठहराया जा सकता, विच्चतु उसके लिए वैज्ञानिक सत्य का आग्रह और विपक्ष की बातों को अवैज्ञानिक उपेक्षा क्या एक दूसरा अंधविश्वास होगा ।
बाहर को जातियाँ हम लोग बारह से आए अथवा भारत के ही सप्त सि'थु भाग से सब जगह पैल्लो,यह विवादास्पद है । किन्तु हमारे देश की सपन्नता, जिसके लिए देवता भी आकर्षित रहत्ते थे, विदेशियों को आकर्षित अवश्य किया । सबने अपनी भाग्य-परीक्षा कौ । तो यूनानियों की भाँति यहां आए, थोड़े दिन ठरहरे और सास्कृतिक प्रदान के पश्चात (जैसे प्रभाव की बात) दबे पाव" लोट गए । वे कुछ दे भी गए ओर ले भी गए । पाइथागोस्स यदि सूनामी दार्शनिकों पर प्रभाव है । अरबों से भी बहुत प्रदान रहा । "हिस्सा" शब्द हिंद" का ऋण स्वीकार कस्ता है । यूरोप में इन्हीं को (अरेबिक न्यूमेरिक्ल) कहा जाता है । हमारे यहॉ उत्तर-पश्चिम दरों से ही जन-आयात्त नहीं हुआ हमारे समुद्रो तट भी जनआयात में उदार रहे हैं । किंरोरित्यस आदि से व्यत्पारिक सबंध रहे हैं l हारे लोग भी उपनिवेश बनाने में पीछे नहीं रहे हैं । सुमात्रा,जावा, बाली, बोरनियो, क्रोलबिया', स्याम आदि द्वीपों में भारतीय सस्कृति की छाप है | रामायण का बहुत प्रभाव है । शक-हूण भी आए, तो हममें समा गए या माग गए l उन दिनों हमारी पाचन-शक्ति जो प्रबल थी । तुर्क और मगोल जाति के राजाओ ने हिदू नाम स्वीकार किए । पारसी लोग यहाँ शरणार्थी बनका आए और बडे, प्रेम पूर्वक रहे । वे हिन्दू सस्कृति को मानने के लिए गोहत्या से बचते रहे । पीछे से भास्तीय लोग अपने जातीय व्यक्तित्व को अक्षुण्य रखने के लिए दूसरों की पचाने में लगे और जाति-माँति का बंधन दिया । मुसलमानों ने हिन्दुओँ से वैवाहिक सबंध स्थापित किए. किन्तु उनमे बराबरी की भावना न थी । हमारी सस्कृति को अपनाया और हमने उनकी सस्कृति को जहॉ तक जातिमाँति के बंधनों में अपना सके, अपनाया ।
