रविवार, 1 जनवरी 2017

Ajay Kumar Patidar

अज्ञेय काव्य में मिथक


सामान्य रूप से मिथक का अर्थ है, ऐसी परम्परागत कथा, जिसका सबंध अतिग्राकत घटनाओ और भावों से होता है । मिथक मूलत: आदिम मानव के मन की सृष्टि है, जिसमे' चेतन की अपेक्षा अचेतन प्रक्रिया का प्रावधान रहता है । त्रिचास्को ने मिथक का धर्म के साथ सबंध स्थापित किया है । एम. एलियड के अनुसार मिथक धार्मिक कथा है और इसीलिए वह सही इतिहास है, क्योकि विश्न का अस्तित्व उसे सिद्ध है । सृष्टि की उत्पत्ति का मिथक भी समान रूप से इसलिए सही है कि मनुष्य अपने अनुष्ठानों से ही सृष्टि की प्रकृति को प्रतिबिबित्त है ।  मिथक का परिवेश अलौकिक तथा धार्मिक होता है I मानव चेतना मिथकीय चेतना से ही विकसित हो यथार्थवादी ऐतिहासिक चेतना में परिवर्तित होती है । मिथक मनुष्य का आदिम है । मिथक में आस्था तथा इससे भी अधिक वृढ़ विश्वास का आधार रहता है । इसी भूमि पर मिथकीय कल्पना का हवा महल खड़ा होता है । आस्था ही मिथक को यथार्थ तथा पुनीत बनाती है वस्तुत: मिथक सामूहिक मानव की अनुभूति का विषय है । मिथक में कथा का अश अनिवार्यत: होता है और उनमें आदिम मानव समाज और प्रकृति के सब का प्रकाशन होता है ।
myth poem


अज्ञेय के काव्य में मिथकों का प्रयोग बाहुल्बे है वह रिएलिटी की पहचान के लिए मिथक का सहारा अनिवार्य मानते हैं । उनकी दृष्टि में - मिथक तर्क बुद्धि से कहीं पुराना है; कि वही प्राक्तन तर्क हैं । उनके अनुसार अर्थात् घीरे धीरे किया के लोप होने सै, ब्राह्मणसे सपर्क छूट जाने से ये सब क्षत्रिय जातियाँ वृषल तथा दस्यु बन गई, जैसे औड, द्रविड, यवन, शक, दरद, खश आदि चार वर्णो से रहित जो जातियों हैं, वे चाहे प्लेच्छ भाषा बोलें और चाहे आर्य भाषा बोलें, सब दस्यु है ।

अज्ञेय के काव्य में भी पौराणिक रहस्याल्फा और बहुत में प्रेममूलक अभिव्यक्ति मिथकीय परिवेश में हुई । महावृक्ष के नीचे काव्य सग्रह में आहत क्या का वर्णन विशेष उलेखनीय है ।

"खुला गिरा मोर पख का किरीट,
चैजयन्ती माल-स्त्रस्त,
छुट पडी. बासुरी"

पैरों के सूक्ष्म घाव से निकल रहा, सृपी शुभ्र, आयु शेष । अज्ञेय मानते हैं कि मिथकीय तर्क में किसी आदिम प्रक्रिया को दोहराना उसके सहारे पुन: क्या होना है । मिथक के द्वारा सस्कतियो का नवीनीकरण होता रहता है । इत्यिलम काव्य सग्रह में कवि ने आदिम मनुष्य द्वारा ज्ञान का मल्ल चखे जाने के पौराणिक आख्यान को नये सदर्भ में प्रस्तुत किया है

"मोह में आदिम पुरूष ने,
ज्ञान का फल तोड खाया,
इसलिए उसने प्रिया सह,
विस्ता निर्बास पाया,
कौन पूछे उन अभागों को, 
किया पथ भ्रष्ट जिसने,
शत्रु जग के उस वास्ता,
साप को  किसने बनाया? 

मानव चेतना मिथकीय चेतना से ही विकसित होकर यथार्थवादी ऐतिहासिक 
चेत्तना में परिवर्तित होती हैं l मिथक में आस्था तथा इससे भी अधिक दृढ विश्वास का आधार रहता है । इसी पृष्ठभूमि पर मिथकीय कल्पना का हवामहल खडा होता है । आस्था ही मिथक को यथार्थ तथा मुचीत्त बनाती है ।
अज्ञेय के दार्शनिक विचारों में मिथक विद्यमान हैं । पौराणिक गाथाओं सकेतों और शब्दों के द्वारा जीवन के रहस्यमय पूर्ण प्रश्नों का समाधान ढूंढा गया है ।

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