शनिवार, 7 जनवरी 2017

Ajay Kumar Patidar

जीवन निर्माण में साहित्य की प्रेरणा

परम्परा रूप से काव्य ही मुख्य श्रोत रहा है  इधर साहित्य और विकसित होता जा रहा है I साहित्य शब्द का अब गद्य और पद्य के रूप में लिया जा रहा है । सस्कृत साहित्य में दो तरह के काव्य रूप माने गये I श्रव्य काव्य और दृश्य काव्य I काव्य का तात्पर्य ही साहित्य माना जाता था। सब कुछ कविता के इर्द गिर्द चक्कर लगाकर टाव पाता था। आचार्य विश्वनाथ ने लिखा कि वाक्य काव्य अर्थात स्स युक्त वाक्य ही काव्य है तो पडितराज जगन्ताथ ने काव्य की परिभाषित करते हुये कि रमणीयार्थ प्रतिपादक शब्द : काव्य अर्थात रमणीय अर्थ का प्रतिपादन शब्द काव्य है यह देखना नितात आवश्यक है कि जीवन, व साहित्य एक दूसरे से कैसे पुष्ट होते है । इस सदर्भ में इतना ही कहना चाहूगा कि जीवन से अनुप्रेस्ति होकर साहित्य रचना की जाती है । और जब जीवन अपने से विमुख होता है तो उस समय साहित्य का दीपक जीवन का पथ निदर्शन करता है । हमारे लोक जीवन में लोक साहित्य का अनूठा स्थान है जिसमें सामाजिक पारिवारिक मूल्यों की सगठंन बडे रोचक ढग से लोक साहित्य में प्राप्त होती हे । 

hindi sahitya


वह चाहे जीवन के किसी भी व्यवहार अथवा कर्म से सम्बधित हो । जीवन का साथ सदैव सहित्य निभाता रहा है I जैसे लोकनाट्य, लोककथा, लोकगाथा, लोक्सगीत्त', लोकभाषा लोक सस्कृति' में निहित रहता है I भले चाहे वह धर्मशास्त्र में धार्मिक गस्थाओ का शास्त्र है I हमारे महान सतो ने धर्म के विषय में जो भी ज्ञान उपलब्ध है I धर्मशास्त्र उसका भडार है I हमारे ऋषियों की अमृतवाणी इसमे समाहित है I घर्म शास्त्र ने हमारे समाज का सदैव दिशा दर्शन किया है । यह विस्मृरु नहीं किया जाना चाहिए की प्रत्येक धर्म क मूल में लोक-विश्यास रहते है और लोक बिस्वास ही लोकसाहित्य के भी मूलाधार है I जीवन के सरस और नीस्स दोनों अवसरों पर साहित्य जीवन का साथ निभाता है I और उसे प्रेरित करता है की जीवन से जिया जाये? यह सर्बमान्य सत्य है I सवसाहित्य को आत्वाले हठ करने वाले व्यक्ति जीवन में शिखर तक पहुचे है I 

साहित्य जीवन का साथ सामाजिक एबं पारिवारिक सभी अवसरो पर निभाते हुए दिखता है I समाज में निवास करने बाली जातियों एब समुदायों की सामाजिक प्रथाओं रीति रिबाजो एवं विश्वासों तक विस्तृत रहता है I साहित्य ने चुकी मानव जीवन की यथा तथ्य अभिव्यक्ति निहित होती है इसलिए सक्ति में ऐसी प्रचुर सामग्री प्राप्त हो जाती है जिसे जीवन जीने की सामाजिक ओर पारिवारिक अभिप्रेरणा साहित्य में प्राप्त होती है अनेक जगली असभ्य एवं आदिम जातियों के जीवन के विविध पक्षों के परिचय का आधार प्राय: साहित्य हो रहा है । प्राचीन प्रथाओं परम्पराओं सामजिक स्माठन आदि से सम्बथित अपेक्षित विवरण वस्तुतग्लाहित्य से ही प्राप्त होता है । विंग्स समय किसी जाती या देश के निवासियों का सामाजिक आचरण कैसा रहा होगा ज्ञानप्रदान काने का कार्य साहित्य ही करता है । व्रत त्यौहार अनुष्ठान सरकार रीति स्पिज्वाज का ज्ञान हमें साहित्य से प्राप्त होता है जीवन युक्त शिष्ट कल्पना का अभिप्रेत साहित्य के रूप में हमारे सामने आता है इसलिए कहा क्या है सहित रसेन सह्युकत्तम तस्य गाव: तो वह मानव फ्लोवृत्तियो का उग्ननयन भी करता है I आवाहिंतं मनसा महर्षिभि: तत् साहित्यं तथा वह समाज का हित साधन भी करता है । 

हित और सहित तट साहित्य शब्द केमूल में सहित होने का भाव निहित है I साहित्य का अर्थ है हित से युक्त होना यथा हितेन सांहेति सहित तत्समभाव: साहित्य व्यक्ति ही समाज की रचना करता है और व्यक्ति ही अपने हित साधन हेतु साहित्य की रचना करता है I इस प्रकार साहित्य की रचना का उद्देश्य मानव समाज का हित करता है साहित्य की क्सोटी मूलत: शिवत्व अर्थात सामाजिक कल्याण है I वर्तमान समय मे जीबनोपार्जन करने के नवीनतम उपाय साहित्यं व्यक्ति को सुझा रहा है I यह मनुष्य जीवन को उत्तरोत्तर उन्नत करने के त्यि भति-भाति के नवीन उपकरण विधा तथा सुझाव प्रस्तुत रहा है साहित्यिक दृष्टि से सम्पन्न व्यक्ति न केवल स्वयं का अपितु समाज जाति कूल एवं राष्ट्र का ही नही वह तो सम्पूर्ण विश्व की उन्नति I
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बुधवार, 4 जनवरी 2017

Ajay Kumar Patidar

साहित्य : समाज का दर्पण प्रो. अतीकुंब्रिस्राखान

मानवों के समुदाय को समाज कहते है । मानव स्वभाव से समुदाय बनाकर रहने का अग्यासी हें । इसीलिए अरस्तू ने मानव को सामाजिक प्राणी कहा है I वह समाज में ही जन्म लेता है और समाज में ही पूर्ण जीवन बिताकर उसके ही अन्दर अन्तकाल को पहुंचता है । समाज के उसका जीवन नहीं और बिना उसके समाज नहीं । इसलिए व्यक्ति और समाज का सम्बन्ध जननी व सन्तान की भाति अभेद्य है I मानव समाज का अग है और समाज उसका अगी I समाज का केन्द्र मानव है और साहित्य का केन्द्र भी मानव ही है और साहित्य का केन्द्र भी मानव ही है । सहित्य का भाव सम्मिक्ति है ईस तरह की हित निहित अभिव्यक्ति समाज से ही अपना पोषण पाती है और समाज का निर्माता मानव ही है I
literature society


समाज एव साहित्य मानव की सक्ति ज्ञानराशि का नाम साहित्य और मान-समुदाय का नाम समाज है । मानव का ज्ञान-भण्डार ही साहित्य है और वह समाज की एक इकाई है । इस प्रकार साहित्य और समाज का, प्राण और शरीर की भाति अटूट सम्बन्ध् है । दोनो के लिए एक-दूसरे की सस्तस आपेक्षित है, अर्थात साहित्य के लिए समाज और समाज के लिए साहित्य है I साहित्य का जन्म समाज के बिना असम्भव है । समाज को साहित्य से नवजीवन प्राप्त होता है और साहित्य समाज के द्वारा ही गौस्वान्वित्त होता है । एक पाश्वात्स्य विद्वाम् ने क्ला है साहित्य जीवन की आलोचना है । वास्तव में सामाजिक जीवन की शोभा साहित्य से ही होती है I भलूँहरि ने तो साहित्य रहित मानव का पशुतुल्य माना है- साहित्य की विशिष्टता उसकी उपादेफ्ता के कारण ही होती है । समाज पर प्रभाव डालने पर साहित्य अरण्यसेदन मात्र है । जिस प्रकार भारतीय दार्शनिक धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष. को जीवन का उददेश्य मानते है, उसी प्रकार भारती साहित्यकार भी रस की अनुभूति के अतिरिक्त धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में विचक्षश्ता और कीर्ति तथा प्रीति की प्राप्ति भी साहित्य के उत्देश्य मानते है I

साहित्य का अभिप्राय हित चिंत्तन है । प्रेम चन्द्र एक स्थान पा साहित्य का स्पष्ट करते हुए लिखते है I साहित्य हमारे जीवन को स्वम्भक्ति है यहीं उसका मुख्य उददेश्य हैं Iसाहित्य समाज का दर्पण है :न केबल भारतीय परम्परा अपितु पश्चिमी परम्परा में भी साहित्य को समाज का दपर्ण कहा है । दर्पण में जिस तरह शरीर प्रतिफलित होता है,  तरह समाज भी साहित्य ने प्रतिफलित होता है, साहित्य की इस दर्षणवादी परम्परा को थ्यान में स्खते हुए कछ विद्वान इसे समाज का फोटोग्राफ भी कहते है, परन्तु साहित्य को समाज का दर्पण या फोटोग्राफ देने से साहित्य का सामाजिक उस्तरदायित्व उभर का सामने नही आ सका क्योकि जैसा कि हम जानते है, दर्पण में या फोटोग्राफी में व्यक्ति का ऐसा चरित्र सामने आता है, जैसा वह होता है, उसमें किसी तरह का कोई पस्पिर्तन नही हो सका है, एक अच्छा फोटोग्राफर यही तक सीमित नही रहता साहित्य वह का दिखाता जो दर्पण नही का सका । साहित्य में न केवल सामाजिक नुरास्यों प्रतिफलित होती है, बल्कि उन बुराइयों को नष्ट करने के उपाय भी बतलाए है । इस मायने में साहित्यकार न केवल  परम्परा का पोषक होता है बल्कि समाज को एक नई दिशा प्रदान में सक्षम होता है । अत: साहित्यकार एक समाज सुधारक भी है! निमणि साहित्य समाज की उपज है, फिर भी कालात्तर में वह एक नये समाज  अत: निषर्कतां यह कहा जा सकता है कि साहित्य और सहित्यनकार एक दूसरे की उपज है बल्कि एक दूसरे से प्रभावित भी है I बिना समाज न केक्ल एक दूसरे के पूरक है बल्कि एक के दूसरे का अस्तित्व खतरे में है I जैसा कि पूर्व में वर्णित किया है I
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मंगलवार, 3 जनवरी 2017

Ajay Kumar Patidar

जीवन निर्माण और मूल्य शिक्षा साहित्य के माध्यम से

मूल्य हमारे व्यवहार को निर्देशित तथा नियत्रित्त हैं I मूल्यों से अभिप्रेरणा को दिशा मिलती है । अभिप्रेरणा से व्यवहार निवत्रित होकर उक्ति दिशा में अग्रसर होता है जो जीक्म निर्माण मे सहायक होता है I
जीवन मूल्यों की बात करें तो आम धास्पा यह है कि कलयुग मे इऩ मूल्यों पर पाना सभव नहीं है जीवन निर्माण मे जब मूल्यों की बात आती है तो हम सच्चाई वफादारी भावना आदर सम्मान की भावना ही जीवन मूल्य हैं इन आधारभूत जीवन मूल्यों पर चलकर ही किसी भी धर कम्पनी समाज व देश चरित्र का निर्माण होता है नियत्रित मूल्य जीवन के लिए उचित रास्ता तय उक्ति रास्ता किसी व्यक्ति समाज व देश को उसकी मजिल तक ले जाता हे I

life development in hindi literature


अनुसारचरित्रवान क्नो जगत अपने आप मुग्ध हो जायेगा चरित्र मानव जीवन वो लिए एक अनमोल रत्न है आज राजनैतिक सामाजिक व्यक्सायिक और प्रशासनिक क्षेत्र में हम जो पा रहे है उसका मुख्य कारण चरित्रवान व्यक्तियो का अभाव ही है निकष्ट स्वार्थ हसान पर इतना हावी हो गया है चरित्रवान व्यक्ति को आज हम सनकी या मूर्ख की सज्ञा देने से नही हिचकते हम बुराई और भ्रष्टाचार कं साथ जीने के आदी होते जा रहे है और यदि यही हाल रहा तो इसकी भारी कीमत हमें चुकानी पडेगी I

सच और झूठ दोनो के साथ देखिये सच हमेशा एक अदरूनी तावन्त एवं पवित्रता का एहसास होता है आत्मविश्वास बढता है जबकि झूठ से हम असहज महसूस करते हैं जव भी कोइ धोखा या चोरी करता है तो मन कचोटता है मुह सूखता है शरीर आत्मविश्वास में कमी आती है खुद की नजरों में गिरा हुआ पाता है क्योकि आत्मा का मूलभूत मूल्य झूठ और धोखा नही बल्कि सच्चाई ईमानदारी और वफादारी है I
इन सभी व्यवहारों की कीमत है ये जीवन निर्माण करते हैं ये मूल्यवान हैं इसलिए इन्हे' जीवन मूल्य कहा गया है I हम जितना अघिक से अधिक व्यवहारों का इस्तेमाल करते जाते है हर बार का व्यवहार अपनी कीमत अदा करता है और हमारे सत्कर्म खाते में जमा होकर परमात्मा की कृपा पाकर सफल जीवन का निर्माण करता है I

कई बार उक्त है कि आज युग में जो ईमानदारी वफादारी सच्चाई के रारत्ते पर चलता है वह जल्दी सफ़ल नहीं होता पर ध्यान से देखें तो जो व्यक्ति जीवन मूल्यों पर अडिग रह कर क्लता है वह कभी भय से नही जीता आत्मविश्वास से दमकता रहता है एवं सुरक्षा का अनुभव करता है क्योकि यही जीवन मूल्य उसके लिए एक सुरक्षा कवच का रूप धारण कर लेते हैं I

इन मूल्यों को करके हर एक को स्वयं में सुधार करना होगा तभी देश में समाज में सुधार होगा भाषा एवं वाणी पशु एवं मनुष्य में भेद उत्पन्न करती है I पशुओं के पास भाषा एवं वाणी नहीं होत्ती और मनुष्य भाषा वाणी बुद्धि विवेक से समृद्ध होते हुए भी समाज को तार तार का उसे पाश्चिक रहा है । भीड. में रहत्ते हुए भी सामूहिकता के प्रेम को त्याग का स्वार्थपूर्ण एकात प्रिय और व्यक्तिगत होना पसद रहा है I
जीवन मूल्यों का विकास समाज में होता है मूल्य समाज को व्यवस्थित करते है । उच्च मूल्यों के निरतर चुनाव करने से यह हमारा स्वभाव एवं व्यक्तित्व का अग बन जात्ते हैं एबं हमारे चरित्र का निर्माण होता है हमारा चरित्र ही चरित्रवान समाज की नीव रख्ता है I

मूल्य शिक्षा की दृष्टि से साहित्य का शिक्षण महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है मध्य काल में सतो" ने मूल्य परक साहित्य की सृज़ना की ओर उनको जनजन तक पहुचाने का कार्य भी किया साहित्य समाज का दर्पण है I समय समय पर परिवेश के अनुसार विभिन्न साहित्यकत्यों ने नाटक उपन्यास कहानी महाकाव्य कविताओं के द्वारा मानव को मूल्य शिक्षा से ओतप्रोत कर समाज को एक नई दिशा दी है ।
भारतीय मूल्यों के मानक गुरू नानक हो' या मूल्यों के जन शिक्षक कबीर हों या मूल्यों के सरक्षक रैदास हो या मूल्य सम्राट गोस्वामी तुलसीदास इन सभी विद्धान साहित्यकारों ने मूल्यों का जीवन ने महत्व बताते हुए जीवन को सार्थक बनाने का प्रयत्स करके समाज व देश का चहुमुखी बिकास करने का भरसक प्रयत्न किया है I
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सोमवार, 2 जनवरी 2017

Ajay Kumar Patidar

उत्तर आधुनिकता और हिन्दी उपन्यास


उत्तर-आधुनिकता का प्रारम्भ फ्रास में हुआ । क्यूबेक सरकार के आग्रह पर फ्रांसीसी विद्वान 'फ्रासु'आक्योतार' ने विकसित समाजों में विज्ञान और तकनीकी भूमिका तथा भाषा और व्यवहार के विषय में कुछ निष्कर्ष निकाले । वे निष्कर्ष 'द पोस्ट माडर्न क्खीशन ए रिपोर्ट आन नालेज' नामक रिपोर्ट में सुंक्षित्त किये गये । यह रिपोर्ट मूल फ्रांसीसी भाषा मे सत् १९७९ में प्रकास्ति हुईं । मानचेस्टर यूनीवर्सिटी प्रेस ने सन १९८६ में इसका अनुवाद प्रकाशित फ्रास आत्योत्तर की रिपोर्ट अथवा पुस्तक में जो 'पोस्ट माडर्न' पद है, इसी को  हिन्दी अनुवाद 'उत्तर आधुनिक' के रूप में हुआ । इसके प्रचलन के बाद आधुनिक को आधुनिकता में बदलकर 'उत्तर आधूनिक्ला ' बचाया गया । बाद में इस धारा को 'उत्तर-आथुनिक्ला' कहा गया । डॉ. सुधीश पचौरी का कथन है कि- " उत्तर आधूनिवन्ता पर कईं लोग ऐसी निष्पत्तियॉ है कि लगता है, जैसै उत्तर-आधुनिकता शुद्ध दर्शन या अवधारणा के क्षेत्र में हुआ कोई बिचार हो । लोग झोक में यह भी सोच सकत्ते हैं कि वह सब कुछ जो आधुनिक्ला के विस्ख जाता है, वह सब 'उत्तर-आधूनिक' है l कई लोग 'उत्तर-आधूनिक्ला' को पश्चिमी समाज में प्रचलित और अविवाहित क्यों श्चियों में देखते है । कई उसे बाजार और उपभोक्ता सस्कति का पर्याय काते है । कई इसे उसका पर्याय मानते हैं, जो अब दूसरी दुनिया के देशों में धर्मत्तत्व वाद के रूप में दिखाई पडते लगा है । 
hindi mythology


'इस्लग्म एण्ड पोस्ट मोडर्निज्म' में लेखक अहमद उत्तर-आधुनिकता वाद को पश्चिम कौ पूमण्डलीय सभ्यता की जीत और इस्लाम के लिए चुनौती मानते हैं । ऐसे भारत में हिन्दुत्व के क्या को उत्तर-आधुनिक स्थिति के प्रति प्रतिक्रिया का एक सकेत किया जा सक्ला है । स्थितियों का यह बहुवचनवाद स्वयं एक उत्तरआधुनिक दृश्य है I इससे स्पष्ट होता है कि भारत में अधिकांश' विचास्क उत्तर आधुनिकता को या तो समझ नही पाये हैं अथवा गलत समझ रहे है I डॉ. सुधीश पचैरी ने उत्तर आधुनिक्ला का समर्थन किया और लोगों को इसे समझाने की कोशिश की है, और हिन्दी जगत् को उत्तर आधुनिकता से सबसे पहले परिचित कराया I आधुनिक शब्द किसी वस्तु या बिचार के साथ नयी जिज्ञासा कर देता हैं, आधुनिकता का अगला चरण उत्तर आधुनिकता है, उत्तर आधुनिकता को एक ऐसे आन्दोलन के रूप में ले लिया जाता हैँ जो आधुनिकतावाद से उपजने के साथ-साथ आधुनिकता के कुछ पहलुओं की आलोचना भी है, क्योकि यह शब्द कई अर्थी में लिया है अत: इसके तत्त्व उत्तर आधुनिक्ला को बढाते. प्रतीत होते है । मूजीचादी० व्यवस्या और सत्कृति' के विकास में आधुनिकता का हाथ रहा है I उत्तर आधुनिकता को मूजीचग्द की सतान माना जा सकता है । उत्तर आधुनिकता पूजविन्दी विकास की नवीन स्थिति है I इसे सामाजिक श्चिद्ररधारा भी का सकते है । उत्तर आधुनिकता का प्रयोग टायनबी ने १९२  किया । तत्पश्चात १९६७ में जान चायं, १९४७ में मीटर बर्गर, १९७५ में लियोताईं ने इस शब्द का प्रयोग किया I लियोताईं ने लिखा है कि "उत्तर आधुनिवल्ता आधुनिकता के भीतर की ही प्रवृति है । जो किसी चीज पर विलाप नहीं कस्ती है । वह यथार्थ क्रमबद्ध और समग्रता की अन्विति से इन्कार है ।"

हिन्दी साहित्य में आधुनिकता से उपजी विसंगतियों का स्पष्ट चित्रण मिलता है I अप्रासक्ति हो चुकी प्राचीन अथवा प्रतिगामी वैचारिक्ला एव फ्लो के बरक्स जीवन में नवीनता का उदूघोष साहित्य आधुनिकता की श्रेणी में रखा गया है I स्वाधीनता आदोलन के  साठ के दशक तक उसमें प्रगतिशीलता के नए-नए व्यक्ति के अस्तित्व एवं समष्टि कल्याण को प्रमुखता दी गई, और उसे समाज का महत्त्वपूर्ण घटक सिद्ध किया I उत्तर आधुनिक्ला के सन्दर्भ में यह विचार जरूरी हो जाता है कि क्या समाज में समानान्तर स्तर पर यह बौध विकसित हुआ हैं? ऐसा तो नहीं कि समाज अपनी जडता से मुक्त हो न सका हो और साहित्य में उत्तर आधुनिकता का नारा बुलंद किया जा रहा हो l
कम से कम भारतीय सामाजिक एवं राजनीतिक सदमों में इस सवाल को कला के परिपेक्ष्य में देखा जाना चाहिए I 
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रविवार, 1 जनवरी 2017

Ajay Kumar Patidar

अज्ञेय काव्य में मिथक


सामान्य रूप से मिथक का अर्थ है, ऐसी परम्परागत कथा, जिसका सबंध अतिग्राकत घटनाओ और भावों से होता है । मिथक मूलत: आदिम मानव के मन की सृष्टि है, जिसमे' चेतन की अपेक्षा अचेतन प्रक्रिया का प्रावधान रहता है । त्रिचास्को ने मिथक का धर्म के साथ सबंध स्थापित किया है । एम. एलियड के अनुसार मिथक धार्मिक कथा है और इसीलिए वह सही इतिहास है, क्योकि विश्न का अस्तित्व उसे सिद्ध है । सृष्टि की उत्पत्ति का मिथक भी समान रूप से इसलिए सही है कि मनुष्य अपने अनुष्ठानों से ही सृष्टि की प्रकृति को प्रतिबिबित्त है ।  मिथक का परिवेश अलौकिक तथा धार्मिक होता है I मानव चेतना मिथकीय चेतना से ही विकसित हो यथार्थवादी ऐतिहासिक चेतना में परिवर्तित होती है । मिथक मनुष्य का आदिम है । मिथक में आस्था तथा इससे भी अधिक वृढ़ विश्वास का आधार रहता है । इसी भूमि पर मिथकीय कल्पना का हवा महल खड़ा होता है । आस्था ही मिथक को यथार्थ तथा पुनीत बनाती है वस्तुत: मिथक सामूहिक मानव की अनुभूति का विषय है । मिथक में कथा का अश अनिवार्यत: होता है और उनमें आदिम मानव समाज और प्रकृति के सब का प्रकाशन होता है ।
myth poem


अज्ञेय के काव्य में मिथकों का प्रयोग बाहुल्बे है वह रिएलिटी की पहचान के लिए मिथक का सहारा अनिवार्य मानते हैं । उनकी दृष्टि में - मिथक तर्क बुद्धि से कहीं पुराना है; कि वही प्राक्तन तर्क हैं । उनके अनुसार अर्थात् घीरे धीरे किया के लोप होने सै, ब्राह्मणसे सपर्क छूट जाने से ये सब क्षत्रिय जातियाँ वृषल तथा दस्यु बन गई, जैसे औड, द्रविड, यवन, शक, दरद, खश आदि चार वर्णो से रहित जो जातियों हैं, वे चाहे प्लेच्छ भाषा बोलें और चाहे आर्य भाषा बोलें, सब दस्यु है ।

अज्ञेय के काव्य में भी पौराणिक रहस्याल्फा और बहुत में प्रेममूलक अभिव्यक्ति मिथकीय परिवेश में हुई । महावृक्ष के नीचे काव्य सग्रह में आहत क्या का वर्णन विशेष उलेखनीय है ।

"खुला गिरा मोर पख का किरीट,
चैजयन्ती माल-स्त्रस्त,
छुट पडी. बासुरी"

पैरों के सूक्ष्म घाव से निकल रहा, सृपी शुभ्र, आयु शेष । अज्ञेय मानते हैं कि मिथकीय तर्क में किसी आदिम प्रक्रिया को दोहराना उसके सहारे पुन: क्या होना है । मिथक के द्वारा सस्कतियो का नवीनीकरण होता रहता है । इत्यिलम काव्य सग्रह में कवि ने आदिम मनुष्य द्वारा ज्ञान का मल्ल चखे जाने के पौराणिक आख्यान को नये सदर्भ में प्रस्तुत किया है

"मोह में आदिम पुरूष ने,
ज्ञान का फल तोड खाया,
इसलिए उसने प्रिया सह,
विस्ता निर्बास पाया,
कौन पूछे उन अभागों को, 
किया पथ भ्रष्ट जिसने,
शत्रु जग के उस वास्ता,
साप को  किसने बनाया? 

मानव चेतना मिथकीय चेतना से ही विकसित होकर यथार्थवादी ऐतिहासिक 
चेत्तना में परिवर्तित होती हैं l मिथक में आस्था तथा इससे भी अधिक दृढ विश्वास का आधार रहता है । इसी पृष्ठभूमि पर मिथकीय कल्पना का हवामहल खडा होता है । आस्था ही मिथक को यथार्थ तथा मुचीत्त बनाती है ।
अज्ञेय के दार्शनिक विचारों में मिथक विद्यमान हैं । पौराणिक गाथाओं सकेतों और शब्दों के द्वारा जीवन के रहस्यमय पूर्ण प्रश्नों का समाधान ढूंढा गया है ।
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शनिवार, 31 दिसंबर 2016

Ajay Kumar Patidar

पश्चिम में तर्क व प्रयोग

450 वर्ष पूर्व गेलीलियॉ से माना जाता है । उसके पूर्व कोपरनिक्स ने यह वैज्ञानिक मान्यता स्थापित की थी कि सूर्य स्थिर है और पृथ्वी उसके आसपास चवकर लगाती है । यस्तु' उस समय साधारण समाज की धारणा, मानसिकता केसी थी, इसका विपूँषण काते हैँ तो ध्यान में आता है कि उस समय जीवन के किसी भी प्रश्न के उत्तर के संदर्भ' में अरस्तू प्रमाण था । कोई भी प्रश्न, कोई भी समस्या खडी. हुईं तो इस सदर्भ३ में अरस्तूने क्या कहा, यह खोजने की एक प्तामान्य प्रवृत्ति थी । इस बारे में एक मनोरजक' कथानक प्रचलित है । एक बार लदन' में किसी हलि में बैठकर कुछ विद्वान परस्पर विचार विमर्श का रहे थे । विचार विमर्श का विक्य था, घोड़े के मुह० में विन्तने दात७ होते हैं? अलग-अलग विद्वान् सख्या" बता रहे थे । परिणाम स्वरूप निर्णय नहीं हो पा रहा था-एक युवक पास में बैठा इनका वार्तालाप उत्सुक्ता से सुन रहा था । इतने में एक विद्वान्बोला-अत्मि निर्णय के लिए देखा जाये कि घोड़े के दात७ के विषय में अरस्तू ने क्या कहा है? अत्त: एक विद्वान्मास के पुस्तकालय में अरस्तूकी पुस्तक खोजने गया l इस बीच यह चर्चा सूनवे क्ला युवक उठा और उस हाल से चाहर क्ला गया । वह बाहर क्ला गया है इस ओर किसी का ध्यान आकर्षित नहीं हुआ । परन्तु कुछ समय बाद लौटका जब वह वापस हाल" में आया तो हठात्सब उसकी और देखने लगे, क्योकि' वापस आते समय उसके साय एक जीवित घोड्रा था । उस घोडे. को सामने खड्रा कर उसने विद्वानों से कहा कि अरस्तूकौ क्यों परेशान करते हो? यह घोड्रा खड्रा है, इसके दात" गिनकर निर्णय का लीजिए h गैलीलियों के पहले सारे यूरोप में मान्यता थी कि भारी वजन चाली वस्तु हल्की वजन वाली वस्तु सै अधिक वेग से गिरेगी, क्योंकि अरस्तूने कहा था कि
एक पौड तथा दस पौड 'का पत्थर यदि ऊपर से पेंत्का जाथे तो दस पॉड का पत्थर दस गुना वेग से नीचे गिरेगा । 

Galileo hindi


गैलीलियों ने इस मान्यता को चुनौती दो और क्या वस्तु चाहे एक पौड की हो या दस पौड की वायु का प्रतिरोध यदि छोड, दिया गां तो दोनों एक साथ जमीन पर गिरेगी । जैसे ही गैलीलियो ने इस मान्यता का प्रतिपादन किया, सारा शहर उस पर टूट पड्रा-तुम अरस्तू से अधिक समझद्या समझते हो अपने को? इस पर गैलीलियो ने कहा,जौ मैंने कहा वह करके बता सक्ला हूँ। इसे सुन सब लोगों में आश्चर्य और उत्सुक्ता जपी और जिस दिन गैलीलियो अपनी बात को प्रयोग द्वारा सिद्ध काने क्ला था, उस दिन पोसा की प्रसिध्द मीनार के पास सारा नगर उमड पडा, । गेलीलियो मीनार पर चढा, सारे लोग ससि रोके ऊपर देखने लगे । इसी समय गेलीलियो ने एक और क्स पौड के दोनों पत्थर एक साथ छोडे और आश्चर्य चकित लीगों ने देखा, दोनों पत्थर एकसाथ जमीन पर गिरे । प्रत्यक्ष अपनी आखों'" से यह प्रयोग देखने के बाद लोगों की प्रतिक्रिया थी, गेलीलियो जरूर काला जादूजानता है, अन्यथा अरस्तूकमौ गलत हो सकते हैं? यह घटना बताती है कि आज से 45० वर्ष पूर्व यूरोप में मानसिकता केसी थी?

अग्रेज' स्वयं क्रो बड्रा बुद्धिमान्मानते हैँ । पातु" वे जब हिन्दुस्थान आये तो उन्होने' कभी रूई नहीं देखौ थी । अत: कपास का पेड़, उससे निक्ली रुई, उसका धागा और कपड्रा उनके लिए नई चीज थी । उन्हे' तो ज्ञात था कि का७ भेड पर होती है और उससे वस्त्र बुनते हैं । अत्त ८ वे कहत्ते थे कि यह हिन्दुस्तानी बड्रा चालाक है । यह ऊन७ जो भेड पर होना चाहिये, वह यह पेड़ पर उगाता है और उससे कपडा. बनाता है । 2 ये तथ्य यूरोपीय मानसिक्ला व प्रयग्गशीलता के प्रति उनकी दृष्टि को बताते हैं 1
यह ठीक है कि पिछले 1 so वर्षों में विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में युरोप में अप्रतिम प्रगति हुई, पर उससे पूर्व का समाज केसा था? उसमें अ'धश्रद्धाएँ हावी थी या तर्क? बाइबिल या चर्च की मान्यताओँ के विपरीत किसी ने तुच्छ कहा, प्रयोग किया तो उनके साथ कैसा व्यवहार किया गया, इस पर थोडा. दृष्टिपात काँगे तो यूरोप की मानसिकता का फ्ता लगेगा ।

( 1 ) गैलीलियो के जन्म से पूर्व लगभग 1 soo वर्ष यूरोप पर अरस्तूके विचारों व धारणाओं का राज्य रहा । क्लोख्यिल टॉत्तेमी ने ई.स्रन् 139 में अरस्तूके अजुसा पृथ्वी केन्दिक विश्व की मान्यता स्थापित की जिसमें पृथ्वी केन्द्र में और सूर्य उसके आसपास चक्कर लगाता है । इन मान्यताओं क्रो चचं का सर'क्षण मिला और ये मान्यताएँ शताब्दियों तक समूचे पश्चिमी जात् में हावी रहीं । पोलैड में जमे कॉपरनिकस ने सन् 1543 में टॉत्तेमी की धारणा के विपरीत यह प्रतिपादित किया कि सूर्य वेन्द्र में है और पृथ्वी उसके आसपास चवक्रर लगाती हैं । उसकी यह स्थापना पश्चिमी विज्ञान के इतिहास का प्रारंभ विन्दु बन गई । चर्च विरुद्ध इस बात का जिस पुस्तक में प्रतिपादन किया गया, उसके छपने के पूर्व क्रोपरनिकस का देहात' हो गया । परन्तु बाद में जब यह पुस्तक प्रकाशित हुई? तो ठस पर प्रतिबंध लगा दिया गया ।

( 2) गैलीलियो ने दूरबीन का आविष्कार किया और उसके द्वारा आकाश का निरीक्षण किया और उसने माया कि सूर्य केन्द्र में होने का कॉपरनिकस का सिद्धात' सहो है l इस पर टालेमी" को मानने वाले लोगों ने दूरबीन के प्रयोग को धर्म बिल्ड कार्य माना । धर्मगुरुओं ने कोपरनिक्स को सही मानना भी पवित्र शास्वी' के विरुद्ध है, ऐसा क्लका गैलीलियो से माफी मगत्नाका' आगे से ऐसा धर्मबिस्ख कार्यं न काने का वचन लिया और उसे घर मे' नजर वैब्द क्सि 1 इस नजर केद की अवस्था में उसने भौतिक शास्त्र ग्रंथ लिखा जिसके छपने के र्ड्स ही वह अंधा हो गया और नज़र वैन्द की अवस्था में ही सन् 1642 में 78 वर्ष को अवस्था में दुनिया को छोड कर क्ला गया ।

( 3) कॉपरनिकस के सूर्य केन्दित सिद्धांत" का समर्थन 1546 में डैनमार्क में जन्मे' खगोलवेत्ता टाइको बूयो ने किया । गणित और धातुशास्त्र में निष्णात ब्रूनो ने 75० तारों को पहचाना । बिना दूरबीन के अवलोकन से उसने ये उपलब्धियों प्रात कॉ । ब्रह्माण्ड में पृथ्वी जैसे अनेक जगतूहैँ, ऐसी उसको स्थापनाओं से क्रोधित हो पोप और पग्दरिचों ने उसे आठ वर्ष तक की में रक्षा और उपने सिद्धातो" से समझौता न करने व माफी न मांगने७ के कारण सन् 1600 में उसे जिदा' क्ला दिया ।

(4) ब्रूनो के साथ सहयोगी रहे स्वतत्र' प्रतिभा के धनी जर्मनी मे' 1571 में
जन्मे' जोन केप्लर ने खगोल शास्त्र का गहरा अध्ययन का ग्रहों की स्थिति व गति के नियम खोजे व उनकी कक्षाओं के नक्शे तैयार किये । उसकी इस समझ को धर्म शास्त्र विरुद्ध मानकर कैथेलिकों ने उस पर हमला विज्या और वह भागता रहा तथा गरीबी व बीमारी की अवस्था मेँ लीस नगर से जाते समय धर्मशाला में 163० मेँ उसकी दुखद मृत्यु हो गई I

अपने मत अथवा स्थापित मान्यता के विरुद्ध फ्लो वाले को जिदा' जलाने, केद में रखने या घुट-घुट का मरने को मजबूर करने वाले ये उदाहरण बताते हैं कि 400 वर्ष पूर्व तक तर्क एवं प्रयोगशीलता के प्रति पश्चिम में क्या दृष्टि थी । भारत में तर्क व प्रयोगों के प्रति दृष्टि
भारत मेंहजारो' वर्ष पूर्व से विद्या के क्षेत्र में पूर्ण स्वातव्य" रहा है ।
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शुक्रवार, 30 दिसंबर 2016

Ajay Kumar Patidar

सस्कृतियो का संमिश्रण - भारतवर्ष की एकता

एकता भारतवर्ष के धर्म, भाषा तथा प्रातीय भेदों पर विदेशियो' ने बहुत बल दिया है । इस देश को उन्होंने एक उप-महाद्वीप है । इस भेद-बुद्धि को तीव्र करके उनकों देश पर अधिकार जमाए रखने में सुविधा मिलती थी । यह बात नहीं कि भारत में प्रात्तीय और भाषा आदि के मेद नहीं हैं, ये भेद सर्वत्र हैँ । इंग्लैण्ड, अमेरिका और अन्यत्र भी हैँ । भेदों में जो एकता होती है वही सौंश्रुष्ट्र और सपन्न' एकता कहलाती है । सर्वत्र एक रसता की एकता दरिद्र एकता होती है । स्वर-साम्य में ही सगीत की अवतारणा होती है ।
Bharatiya Sanskriti


भास्तीय सस्कृति में भी इसी प्रकार की एकता है । इस एकता का मूल स्रोत आर्य सस्कृति है । गगाजी की अस्ति उसमें नदी का मिश्रण होता रहा है, परन्तु उसको पावनी शक्ति इतनी प्रबल रही है कि सबको रूप मिल गया है । इस सगमित रूप में ही इसका विकास होता रहा है । यद्यपि इस विकास श्रृंखला' की आदिम और अतिम कडियों में महान् अतर है, तथापि उनमें एक विशेष तास्तम्य रहा है और उनमे माला की गुरियों को बाँधने वाली एक सूत्रता का अभाव नहीं रहा है ।

एकता के सूत्रयद्यपि यह बात ठीक है कि भारत का प्रान्तो में विभाजन करके उनमे पार्थक्य की खाई को गहरा बनाने वाले भाषा, रीति-रित्नाज, शिष्टाचार, ऊसर, पर्वत, सघन वन तथा नदियाँ और ऊबड़-खाबड़ मार्ग जैसे कारण वर्त्तमान रहे हैं, तथापि भारत में एक्ला का तास्मत्य स्थापित करने वाले सृहुँत्रों का भी अभाव नहीं रहा है । सस्मृन्त भाषा और पीछे से भाषाओ का धर्मिक महत्व रहा है । ये भाषाएं पारस्परिक सम्बन्ध को स्थाक्ति करने में बडी सहायक हुई हिन्दूतीर्ध बदरीनारायण से सेतुबंध रामेश्वरम् तक, ज़गन्नाथ पुरी से द्वारका तक यात्री को भारतभूमि की चारों दिशाओं से परिचित करा देते हैं । भारत की मथुरा, माया, काशी, काची आदि मोक्षदायक पुरियाँ भारत की प्रदक्षिणा का देती हैं । तक्षशिला , नालदा (बिहार) , विक्रमशिला ( भागलपुर जिले के सुलतानगज के पास) आदि विश्वविद्यालय तथा, नवद्वीप, (बगाल), आदि अखिल ख्यक्ति के शिक्षा-केन्द्र थे । विद्यार्थी और शिक्षक प्रातीय मेद भूलकर एक व्यापक सस्कृति के निर्माण में योग देते थे आचार्य, वैरागी, स्वामी, सन्यासी और व्यापारी सस्कृति की धस्याओं का सम्मिश्रण कस्ते रहे है । सिपाही और विजेता लोग भी सस्कृति और भाषा के प्रचारक तथा चाहक रहे हैँ । इस प्रकार के रहत्ते हुए भी भारतीय सस्कृति के प्रचार, विकास और एकीकरण के लिए राजमार्ग खुले रहे हैं ।

आर्य और दविढ़ सबसे पहले भेद को बात आर्य और द्रविड़सस्कृति की कही जाती है । द्रविडों को मूल निवासी और आर्यों को बाहर से आए विजेता बताया जाता है । उन विजेताओं के आगे-पोछे आने वाले थी माने जाते हैँ और द्रबिड़ लोग श्री बाहर के आए हुए बताए जाते है यह प्रश्न तो सदा विवादग्रस्त है कि आर्य लोग क्या से आए और जब स्वयं भारत की उत्तरी सीमाएँ निश्चित न हो तब यह प्रश्न ओर भी जटिल हो जाता हैँ । भारतीय दृष्टिकोण तो यह है कि द्रविड़ लोग भी बिगड़े हुए आर्य है । मनु मह्माराज ने भी शक आदि को  क्रियाहीन क्षत्रिय माना है । रावण ब्राह्मण ही था और मुलस्ला ऋषि का नाती था, फिर भी उससे सघर्ष रहा । वेदों में शत्रुओं से सघर्ष की बात अवाम आती है, किंतु यह बिगड़े हुए आर्यों से भी हो सक्ता हैं । शकों, यवनों, दरर्दो आदि के सबंध में मनु महाराज का यही है कि ये क्रियालुस हो जाने के कास्पा तथा ब्राह्मण-दर्शन के प्रभाव सै बाहर हो जाने के कारण आर्यो से बाहर हो गए थे ।

अर्थात् घीरेधीरे किया के लोप होने सै, ब्राह्मण-फ्लो से सपर्क' छूट जाने से ये सब क्षत्रिय जातियाँ वृषल तथा दस्यु बन गई, जैसे र्मड्रि, औड्र, द्रविड, चक्ति, यवन, शक, दरद, खश आदि चार वर्णो से रहित जो जातियों हैं, वे चाहे भाषा बोलें और चाहे आर्य भाषा बोलें, सब दस्यु हैँ ।
मध्य एशिया या यूरोप के लोगों के साथ भाषा की समानता की बात दुधारी तलवार है । यहाँ से भी आर्य लोग उधर जा सकते थे । इसमें निश्चयपूर्वक 'इदं इत्थ' को देना कुछ कठिन बात है । पाश्चात्य विद्वानो के तर्क को सहसा तो निराधार नहीं ठहराया जा सकता, विच्चतु उसके लिए वैज्ञानिक सत्य का आग्रह और विपक्ष की बातों को अवैज्ञानिक उपेक्षा क्या एक दूसरा अंधविश्वास होगा ।

बाहर को जातियाँ हम लोग बारह से आए अथवा भारत के ही सप्त सि'थु भाग से सब जगह पैल्लो,यह विवादास्पद है । किन्तु हमारे देश की सपन्नता, जिसके लिए देवता भी आकर्षित रहत्ते थे, विदेशियों को आकर्षित अवश्य किया । सबने अपनी भाग्य-परीक्षा कौ । तो यूनानियों की भाँति यहां आए, थोड़े दिन ठरहरे और सास्कृतिक प्रदान के पश्चात (जैसे प्रभाव की बात) दबे पाव" लोट गए । वे कुछ दे भी गए ओर ले भी गए । पाइथागोस्स यदि सूनामी दार्शनिकों पर प्रभाव है । अरबों से भी बहुत प्रदान रहा । "हिस्सा" शब्द हिंद" का ऋण स्वीकार कस्ता है । यूरोप में इन्हीं को  (अरेबिक न्यूमेरिक्ल) कहा जाता है । हमारे यहॉ उत्तर-पश्चिम दरों से ही जन-आयात्त नहीं हुआ हमारे समुद्रो तट भी जनआयात में उदार रहे हैं । किंरोरित्यस आदि से व्यत्पारिक सबंध रहे हैं l हारे लोग भी उपनिवेश बनाने में पीछे नहीं रहे हैं । सुमात्रा,जावा, बाली, बोरनियो, क्रोलबिया', स्याम आदि द्वीपों में भारतीय सस्कृति की छाप है | रामायण का बहुत प्रभाव है । शक-हूण भी आए, तो हममें समा गए या माग गए l उन दिनों हमारी पाचन-शक्ति जो प्रबल थी । तुर्क और मगोल जाति के राजाओ ने हिदू नाम स्वीकार किए । पारसी लोग यहाँ शरणार्थी बनका आए और बडे, प्रेम पूर्वक रहे । वे हिन्दू सस्कृति को मानने के लिए गोहत्या से बचते रहे । पीछे से भास्तीय लोग अपने जातीय व्यक्तित्व को अक्षुण्य रखने के लिए दूसरों की पचाने में लगे और जाति-माँति का बंधन दिया । मुसलमानों ने हिन्दुओँ से  वैवाहिक सबंध स्थापित किए. किन्तु उनमे बराबरी की भावना न थी । हमारी सस्कृति को अपनाया और हमने उनकी सस्कृति को जहॉ तक जातिमाँति के बंधनों में अपना सके, अपनाया । 
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