परम्परा रूप से काव्य ही मुख्य श्रोत रहा है इधर साहित्य और विकसित होता जा रहा है I साहित्य शब्द का अब गद्य और पद्य के रूप में लिया जा रहा है । सस्कृत साहित्य में दो तरह के काव्य रूप माने गये I श्रव्य काव्य और दृश्य काव्य I काव्य का तात्पर्य ही साहित्य माना जाता था। सब कुछ कविता के इर्द गिर्द चक्कर लगाकर टाव पाता था। आचार्य विश्वनाथ ने लिखा कि वाक्य काव्य अर्थात स्स युक्त वाक्य ही काव्य है तो पडितराज जगन्ताथ ने काव्य की परिभाषित करते हुये कि रमणीयार्थ प्रतिपादक शब्द : काव्य अर्थात रमणीय अर्थ का प्रतिपादन शब्द काव्य है यह देखना नितात आवश्यक है कि जीवन, व साहित्य एक दूसरे से कैसे पुष्ट होते है । इस सदर्भ में इतना ही कहना चाहूगा कि जीवन से अनुप्रेस्ति होकर साहित्य रचना की जाती है । और जब जीवन अपने से विमुख होता है तो उस समय साहित्य का दीपक जीवन का पथ निदर्शन करता है । हमारे लोक जीवन में लोक साहित्य का अनूठा स्थान है जिसमें सामाजिक पारिवारिक मूल्यों की सगठंन बडे रोचक ढग से लोक साहित्य में प्राप्त होती हे ।
वह चाहे जीवन के किसी भी व्यवहार अथवा कर्म से सम्बधित हो । जीवन का साथ सदैव सहित्य निभाता रहा है I जैसे लोकनाट्य, लोककथा, लोकगाथा, लोक्सगीत्त', लोकभाषा लोक सस्कृति' में निहित रहता है I भले चाहे वह धर्मशास्त्र में धार्मिक गस्थाओ का शास्त्र है I हमारे महान सतो ने धर्म के विषय में जो भी ज्ञान उपलब्ध है I धर्मशास्त्र उसका भडार है I हमारे ऋषियों की अमृतवाणी इसमे समाहित है I घर्म शास्त्र ने हमारे समाज का सदैव दिशा दर्शन किया है । यह विस्मृरु नहीं किया जाना चाहिए की प्रत्येक धर्म क मूल में लोक-विश्यास रहते है और लोक बिस्वास ही लोकसाहित्य के भी मूलाधार है I जीवन के सरस और नीस्स दोनों अवसरों पर साहित्य जीवन का साथ निभाता है I और उसे प्रेरित करता है की जीवन से जिया जाये? यह सर्बमान्य सत्य है I सवसाहित्य को आत्वाले हठ करने वाले व्यक्ति जीवन में शिखर तक पहुचे है I
साहित्य जीवन का साथ सामाजिक एबं पारिवारिक सभी अवसरो पर निभाते हुए दिखता है I समाज में निवास करने बाली जातियों एब समुदायों की सामाजिक प्रथाओं रीति रिबाजो एवं विश्वासों तक विस्तृत रहता है I साहित्य ने चुकी मानव जीवन की यथा तथ्य अभिव्यक्ति निहित होती है इसलिए सक्ति में ऐसी प्रचुर सामग्री प्राप्त हो जाती है जिसे जीवन जीने की सामाजिक ओर पारिवारिक अभिप्रेरणा साहित्य में प्राप्त होती है अनेक जगली असभ्य एवं आदिम जातियों के जीवन के विविध पक्षों के परिचय का आधार प्राय: साहित्य हो रहा है । प्राचीन प्रथाओं परम्पराओं सामजिक स्माठन आदि से सम्बथित अपेक्षित विवरण वस्तुतग्लाहित्य से ही प्राप्त होता है । विंग्स समय किसी जाती या देश के निवासियों का सामाजिक आचरण कैसा रहा होगा ज्ञानप्रदान काने का कार्य साहित्य ही करता है । व्रत त्यौहार अनुष्ठान सरकार रीति स्पिज्वाज का ज्ञान हमें साहित्य से प्राप्त होता है जीवन युक्त शिष्ट कल्पना का अभिप्रेत साहित्य के रूप में हमारे सामने आता है इसलिए कहा क्या है सहित रसेन सह्युकत्तम तस्य गाव: तो वह मानव फ्लोवृत्तियो का उग्ननयन भी करता है I आवाहिंतं मनसा महर्षिभि: तत् साहित्यं तथा वह समाज का हित साधन भी करता है ।
हित और सहित तट साहित्य शब्द केमूल में सहित होने का भाव निहित है I साहित्य का अर्थ है हित से युक्त होना यथा हितेन सांहेति सहित तत्समभाव: साहित्य व्यक्ति ही समाज की रचना करता है और व्यक्ति ही अपने हित साधन हेतु साहित्य की रचना करता है I इस प्रकार साहित्य की रचना का उद्देश्य मानव समाज का हित करता है साहित्य की क्सोटी मूलत: शिवत्व अर्थात सामाजिक कल्याण है I वर्तमान समय मे जीबनोपार्जन करने के नवीनतम उपाय साहित्यं व्यक्ति को सुझा रहा है I यह मनुष्य जीवन को उत्तरोत्तर उन्नत करने के त्यि भति-भाति के नवीन उपकरण विधा तथा सुझाव प्रस्तुत रहा है साहित्यिक दृष्टि से सम्पन्न व्यक्ति न केवल स्वयं का अपितु समाज जाति कूल एवं राष्ट्र का ही नही वह तो सम्पूर्ण विश्व की उन्नति I
