सोमवार, 2 जनवरी 2017

Ajay Kumar Patidar

उत्तर आधुनिकता और हिन्दी उपन्यास


उत्तर-आधुनिकता का प्रारम्भ फ्रास में हुआ । क्यूबेक सरकार के आग्रह पर फ्रांसीसी विद्वान 'फ्रासु'आक्योतार' ने विकसित समाजों में विज्ञान और तकनीकी भूमिका तथा भाषा और व्यवहार के विषय में कुछ निष्कर्ष निकाले । वे निष्कर्ष 'द पोस्ट माडर्न क्खीशन ए रिपोर्ट आन नालेज' नामक रिपोर्ट में सुंक्षित्त किये गये । यह रिपोर्ट मूल फ्रांसीसी भाषा मे सत् १९७९ में प्रकास्ति हुईं । मानचेस्टर यूनीवर्सिटी प्रेस ने सन १९८६ में इसका अनुवाद प्रकाशित फ्रास आत्योत्तर की रिपोर्ट अथवा पुस्तक में जो 'पोस्ट माडर्न' पद है, इसी को  हिन्दी अनुवाद 'उत्तर आधुनिक' के रूप में हुआ । इसके प्रचलन के बाद आधुनिक को आधुनिकता में बदलकर 'उत्तर आधूनिक्ला ' बचाया गया । बाद में इस धारा को 'उत्तर-आथुनिक्ला' कहा गया । डॉ. सुधीश पचौरी का कथन है कि- " उत्तर आधूनिवन्ता पर कईं लोग ऐसी निष्पत्तियॉ है कि लगता है, जैसै उत्तर-आधुनिकता शुद्ध दर्शन या अवधारणा के क्षेत्र में हुआ कोई बिचार हो । लोग झोक में यह भी सोच सकत्ते हैं कि वह सब कुछ जो आधुनिक्ला के विस्ख जाता है, वह सब 'उत्तर-आधूनिक' है l कई लोग 'उत्तर-आधूनिक्ला' को पश्चिमी समाज में प्रचलित और अविवाहित क्यों श्चियों में देखते है । कई उसे बाजार और उपभोक्ता सस्कति का पर्याय काते है । कई इसे उसका पर्याय मानते हैं, जो अब दूसरी दुनिया के देशों में धर्मत्तत्व वाद के रूप में दिखाई पडते लगा है । 
hindi mythology


'इस्लग्म एण्ड पोस्ट मोडर्निज्म' में लेखक अहमद उत्तर-आधुनिकता वाद को पश्चिम कौ पूमण्डलीय सभ्यता की जीत और इस्लाम के लिए चुनौती मानते हैं । ऐसे भारत में हिन्दुत्व के क्या को उत्तर-आधुनिक स्थिति के प्रति प्रतिक्रिया का एक सकेत किया जा सक्ला है । स्थितियों का यह बहुवचनवाद स्वयं एक उत्तरआधुनिक दृश्य है I इससे स्पष्ट होता है कि भारत में अधिकांश' विचास्क उत्तर आधुनिकता को या तो समझ नही पाये हैं अथवा गलत समझ रहे है I डॉ. सुधीश पचैरी ने उत्तर आधुनिक्ला का समर्थन किया और लोगों को इसे समझाने की कोशिश की है, और हिन्दी जगत् को उत्तर आधुनिकता से सबसे पहले परिचित कराया I आधुनिक शब्द किसी वस्तु या बिचार के साथ नयी जिज्ञासा कर देता हैं, आधुनिकता का अगला चरण उत्तर आधुनिकता है, उत्तर आधुनिकता को एक ऐसे आन्दोलन के रूप में ले लिया जाता हैँ जो आधुनिकतावाद से उपजने के साथ-साथ आधुनिकता के कुछ पहलुओं की आलोचना भी है, क्योकि यह शब्द कई अर्थी में लिया है अत: इसके तत्त्व उत्तर आधुनिक्ला को बढाते. प्रतीत होते है । मूजीचादी० व्यवस्या और सत्कृति' के विकास में आधुनिकता का हाथ रहा है I उत्तर आधुनिकता को मूजीचग्द की सतान माना जा सकता है । उत्तर आधुनिकता पूजविन्दी विकास की नवीन स्थिति है I इसे सामाजिक श्चिद्ररधारा भी का सकते है । उत्तर आधुनिकता का प्रयोग टायनबी ने १९२  किया । तत्पश्चात १९६७ में जान चायं, १९४७ में मीटर बर्गर, १९७५ में लियोताईं ने इस शब्द का प्रयोग किया I लियोताईं ने लिखा है कि "उत्तर आधुनिवल्ता आधुनिकता के भीतर की ही प्रवृति है । जो किसी चीज पर विलाप नहीं कस्ती है । वह यथार्थ क्रमबद्ध और समग्रता की अन्विति से इन्कार है ।"

हिन्दी साहित्य में आधुनिकता से उपजी विसंगतियों का स्पष्ट चित्रण मिलता है I अप्रासक्ति हो चुकी प्राचीन अथवा प्रतिगामी वैचारिक्ला एव फ्लो के बरक्स जीवन में नवीनता का उदूघोष साहित्य आधुनिकता की श्रेणी में रखा गया है I स्वाधीनता आदोलन के  साठ के दशक तक उसमें प्रगतिशीलता के नए-नए व्यक्ति के अस्तित्व एवं समष्टि कल्याण को प्रमुखता दी गई, और उसे समाज का महत्त्वपूर्ण घटक सिद्ध किया I उत्तर आधुनिक्ला के सन्दर्भ में यह विचार जरूरी हो जाता है कि क्या समाज में समानान्तर स्तर पर यह बौध विकसित हुआ हैं? ऐसा तो नहीं कि समाज अपनी जडता से मुक्त हो न सका हो और साहित्य में उत्तर आधुनिकता का नारा बुलंद किया जा रहा हो l
कम से कम भारतीय सामाजिक एवं राजनीतिक सदमों में इस सवाल को कला के परिपेक्ष्य में देखा जाना चाहिए I 

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