वर्तमान हिन्दी साहित्य में सूर्यबाला एक प्रतिष्टित नाम है l सूर्यबाला ने अपनी लेखनी के द्वारा सामाजिक परिवर्तन को समग्रता में अभिव्यक्ति दी है । साहित्यिक कलाकार अपनी विधायक क्लाना द्वारा समाज की पुनर्रचना करता है । कला में जीवन की जो पुनर्रचना होती है वह सास्त: उस जीवन का है,जो जीवन इस ससार में वस्तुत: जिया या भोगा जाता है । यदि साहित्य का सृष्टा मानव है तो मानव जीवन का चित्रण करना ही साहित्य का उद्ददेश्य है । साहित्य का मानव-जीवन से एवं घनिष्ठ सबध है । साहित्य के द्वारा ही मानव-जीवन के विविध रूपो,घटनाओं, समस्याओ,भावनाओ, विचारधाराओं और जीवन मूल्यों को अभिव्यक्ति मिलती है । सहित्य मानव जीवन सापेक्ष होता है और मानव-जीवन साहित्य से प्रभावित होता है ।
सूर्यबाला कहानीकार और व्यग्यकार दोनों ही है । आरंभ में इनकी रुचि कविताओं की ओर थी । समकालीन कथा साहित्य मे सूर्यबाला का लेखन अपनी विशिष्ट भूमिका और महत्व है । अब तक इनके पाच उपन्यास, ग्यारह कहानी सग्रह और चार व्यग्य सग्रह प्रकासित हो चुके हैं । सूर्यबाला का साहित्यिक अवदान उपन्यास सूर्यबाला प्रकाशित उपन्यास है मेरे सौंध पत्र सुबह के इंतजार तक अग्नि पखौ यामिनी कथा दीक्षात ।
' कहानी सग्रह ' ग्याम्ह प्रकाशित संग्रह इस सूर्यबाला के कथा साहित्य में मानवमूल्य कहानी सग्रह': ग्याम्ह प्रकाशित संग्रह इस प्रकार हैं एक इंद्रधनुष जुवेचा के नाम, दिशाहीन-मे, थाली भर चदि, मुडेर पर, 'गृहप्रवेश', 'इक्सीस कहानियॉ', 'पचि लम्बी कहानियॉ', 'सिस्टर ! प्लीज तुम जाना नहीं ', 'मानुष-गंध' I
साहित्य का बिषय मानव-जीवन है और मानव-जीवन का शाश्वत लक्षण है, गतिशीलता और परिवर्तनशीलता । इन सब परिवर्तनों को साहित्य अपने में समाहित लेता है । दार्शनिकों एवं विचारकों की अपेक्षा व्यक्ति की जीवन दृष्टि का आधार अधिकता साहित्य-प्रदत्त जीवन-सिखाते ही होते है । उत्तर भारतीय जीवन पर तुलसी के प्रभाव को आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इन शब्दों मे स्वीकारा है कि ' आज का उत्तर भारत तुलसीदास का रचा हुआ है । वे ही इसके मेरुदण्ड हैं ।
सत्य, शिव और सुदर' की आराधना को शाश्वत है, यानी जीवन में इनका रूप अपरिवर्तित है । हम जीवन को गतिशील और विकासमान समझते हैं । जड़, स्थावर नहीं । सत्य और सुंदर के भी अधिकाधिक विकसित मन हमे समाज और में मिलते हैं ।’ कहा जाता है कि साहित्य अपने युग का आइना होता है क्योकि एक साहित्यकार जिस देश, समाज मे रहता है वहाँ की घटनाओ को अपने आस-पास घटित होते देखता है जो उसे बहुत प्रभावित हैं । उसी से प्रभावित होकर वह साहित्य सृजन है । अपनी अनुभूति का माध्यम मध्यम वर्गीय समाज को बनाया और ठनका चित्रण अपने कथा साहित्य में किया । आप्रिपखी में को शहर के मशीनी जीवन में माँ व पति के साथ आर्थिक चुनौतियों तथा आभावों से जूझते दिखाया गया है ।
साहित्य एक विशाल समुद्र है जिसमें उपन्यास के सम्बन्ध में डॉ. उषा सक्सेना काली हैं उपन्यास एक विशाल सरिता है जिसमें व्यक्ति समाज का प्रतिबिब है l यह सरिता विस्ता गतिशील है इसलिए भी प्रतिबिब गतिशील होता है । ' ग्रेपचन्द लिखते हैं- हम जीबन में जो कुछ देखते हैं या जो कुछ हम पर गुजरती है, वही अनुभव और वही चोटे साहित्य-सृजन की प्रेरणा करती हैं । कबि या साहित्यकार में अनुभूति की जितनी तीव्रता होती है, उसकी रचना उतनी ही आकर्षक और ऊचे दर्जे की होती है । इस प्रकार मानव जीवन और साहित्य एक दूसरे के सापेक्ष तथा परिपूरक हैं । साहित्यकार अपनी पूरी कुशलता और अनुभव से समाज की सब्जी तस्वीर साहित्य में ढाल देता है ।
मारप्परिक अवधारणाएँएवं दृष्टि: हमारे यहाँ सबन्यौ का पारपरिक दृष्टिकोंण प्रचलित है परंपरावादी' होना यहॉ रुढिवादी होना नहीं है I जीवन के मार्ग में आवश्यक परिवर्तनों कौ स्वीकार हुए व्यापक दृष्टिकोण अपनाने में ही उन्नति और विकास निहित है l डॉ. शकर दयाल शर्मा लिखते हैं "हमारी आधुनिक्ला की जडें. हमारी परंपरा' के समृद्ध तत्वों में हैं, तभी हमारा वर्तमान स्स युक्त है । अन्यथा ऊपर से लादी गई यह आधूनिक्ला पारस्परिक एवं सामाजिक बिखराव का कारण बन जाएगी यह बिखराव के विन्ह हमारे समाज में दिखाई देने लगे हैं ।
ऐसे समय में सूर्यबाला अपने कथा साहित्य के माध्यम से कूचों कौ पुर्नस्थापना के द्वारा बचाये रखने का सदेश देती है । उनकी कहानी 'कात्यायनी सचाद' ' की कात्या पति के गुस्सेल और बदमिजाज होने पर भी उसकी अपफ्ता का फायदा नहीं उठाती बल्कि पूरे मनोयोग से उसकी सेवा कस्ती है । वह अपनी सहेली को उत्तर देती है- देना तो उसे चाहिए न जिसे और कोई देने वाला न हो ।
परपराओं और आधुनिक्ला के बीच पिसता हुआ भारतीय जनमानस आज घुटन महसूस कर रहा है । वह न तो पूरी तरह आधुनिक हो पा रहा है और न ही पूरी तरह अपनी परम्पराओ, सस्कृति को छोड़ पा रहा है । यही हाल सूर्यबाला की कहानी 'दिशाहीन' के नायक का शहर के कालेज में पहुचने पर होता है । सूर्यबाला ने महानगर में कस्बाती सस्कारों के कठिन सामजस्य को रचना में अनेक स्थलों पर रेखक्ति किया है, जो उनकी मैनी सूझबूझ और समाज शास्वीय दृष्टि का ही परिचायक है । हमारी सस्कृति में उपयोगी को ग्रहण करने और अनुपयोगी को त्यागो विद्यमान है । डॉ. उपेन्द्रनाथ ठाकुर लिखते हैँ- विश्व की विशिष्ट संस्कृतियों' में भारतीय सस्कृति का महत्त्वपूर्ण स्थान रहा है I